उत्तराखंड के दो-दिनीय विशेष विधान सभा सत्र में विधायक विनोद चमोली, मोहम्मद शहजाद और मदन बिष्ट ने जो मुख्य सवाल उठाए — पहचान, पलायन, स्वास्थ्य, अतिक्रमण व शिक्षा-सिलेबस तक — उनका पूरा विश्लेषण। स्रोत और सिफारिशें।
उत्तराखंड के हालिया दो-दिनीय विशेष विधान सभा सत्र में पारम्परिक विषयों के साथ-साथ लंबे समय से अनदेखे रहे स्थानीय और संवेदनशील मुद्दे सदन में जोर-शोर से उठे। राष्ट्रपति के संबोधन व सरकार के आयोजनों के वातावरण में भी सदन के अंदर तीखी बहसें चलीं — विशेषकर पहचान, पलायन (migration), भूमि-अतिक्रमण, स्वास्थ्य सेवाओं और मदरसों/शैक्षिक पाठ्यक्रम जैसे मुद्दों पर। राष्ट्रपति के संबोधन और सत्र का औपचारिक संदर्भ भी इस पृष्टभूमि में था।
“उत्तराखंड विधानसभा सत्र — सवालों के पीछे की कहानी”
नमस्कार दोस्तों,
आज हम बात करेंगे Uttarakhand में आयोजित दो-दिनीय विशेष विधान सभा सत्र की — जहाँ कुछ वो सवाल उठे, जिन्हें अक्सर सीने में दबा दिया जाता था। विशेष रूप से हम तीन विधायकों — विनोद चमोली, मोहम्मद शहजाद और मदन (मदान) बिष्ट — द्वारा उठाए गए सवालों की तह करेंगे।
विनोद चमोली का बड़ा सवाल — “उत्तराखंड धर्मशाला बन गया है?”
अब यहाँ सबसे तीखा और दिल से निकला सवाल आया विधायक विनोद चमोली की ओर से।
उन्होंने वो बात कही, जिसे आज पहाड़ का हर युवा, हर बुजुर्ग महसूस कर रहा है — लेकिन सत्ता में बैठकर कम ही लोग बोलते हैं।
चमोली ने कहा,
“जब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था — मूल निवास एक प्रक्रिया थी, हम बनवाते थे।
लेकिन 2000 में जब राज्य बना — तब पहली सरकार को तय करना चाहिए था कि हमारा मूल निवासी कौन?
आज हालत ये है कि 15 साल पहले जो आया, वो मूल निवासी हो गया… और जो असली उत्तराखंडी है, उसे ढूँढना मुश्किल हो गया है।”
उन्होंने यहाँ कोई पार्टी-नाम नहीं लिया — बल्कि साफ कहा कि यह पूरी राज्य-प्रणाली की गलती है।
और फिर सबसे बड़ा बयान:
“उत्तराखंड धर्मशाला बन गया है।
जो आता है — निवासी बन जाता है, फायदे ले जाता है।
और हमारा सीधा-सादा पहाड़ी उत्तराखंडी मुँह ताकता रह जाता है।
ये है हमारा उत्तराखंड?”यह वही सवाल है जो हर पहाड़ी मन में है —
पहाड़ का बेटा मेहनत करे, बाहर वाला फायदा ले जाए…
तो फिर राज्य बनने का मकसद क्या था?चमोली ने सिस्टम पर सीधा वार किया:
“आखिर किसने ये सिस्टम खराब किया? इस पर चर्चा क्यों नहीं होती?”
यह वही सवाल है जो हर पहाड़ी मन में है —
पहाड़ का बेटा मेहनत करे, बाहर वाला फायदा ले जाए…
तो फिर राज्य बनने का मकसद क्या था?
चमोली ने सिस्टम पर सीधा वार किया:
“आखिर किसने ये सिस्टम खराब किया? इस पर चर्चा क्यों नहीं होती?”
उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग चुनाव जीतकर सदन तक नहीं पहुंच पाए, वो भी सड़कों पर आवाज उठा रहे हैं — और भले उनकी संख्या कम हो,
उनके सवाल 100% जायज़ हैं।
अक्सर पहाड़ी राजनीति हमें “पहाड़ी–मैदानी” और “हिंदू–मुस्लिम” जैसे शब्दों में बाँट देती है, ताकि असली मुद्दे दबे रहें।
लेकिन आज जब एक मुस्लिम और मैदानी कहे जाने वाले विधायक ने पहाड़ और पलायन पर सबसे सख्त आवाज़ उठाई, सत्ता को आईना दिखाया — तो पहाड़ का हर दिल गर्व से भर उठा। नाम- मोहम्मद शहजाद (लक्सर से बसपा विधायक)
मोहम्मद शहजाद — “पलायन रुकेगा कैसे, जब पहाड़ छोड़कर नीति खुद मैदान में बन रही है?”
विधानसभा के सत्र में मोहम्मद शहज़ाद ने वह सवाल उठाया जिसे सुनकर सत्ता पक्ष भी असहज हो गया और विपक्ष भी चुप।
उन्होंने तंज नहीं, बल्कि तर्क के साथ कहा:
“सरकार आपकी है, तंत्र आपका है… फिर भी आप पलायन को क्यों नहीं रोक पा रहे?”
यह सवाल सिर्फ राजनीतिक हमला नहीं था,
यह उत्तराखंड की नस पर उंगली रखने जैसा था।
“पहाड़ से जीतते हैं… पर पहला मकान देहरादून में बनता है”
इसके बाद शहज़ाद ने एक तीखा और कड़वा सच कहा —
जो पहाड़ी जनता शायद वर्षों से महसूस कर रही थी,
पर सदन में किसी ने इतनी स्पष्टता से नहीं बोला था।
उन्होंने कहा:
“पहाड़ से जो विधायक चुनकर आता है,
सबसे पहले देहरादून या उधम सिंह नगर में मकान बनाता है।”
और यहीं सवाल पैदा होता है —
जो नेता खुद पहाड़ में नहीं रहना चाहता,
वो पहाड़ के लोगों का भविष्य कैसे बदलेगा?
क्या यह सच नहीं कि
हमारे पहाड़ विकास योजनाओं से ज़्यादा “भूमि बिक्री योजनाओं” में फँसे हुए हैं?
शहज़ाद का तर्क — नेतृत्व की मंशा साफ करो
शहज़ाद ने आरोप नहीं लगाया,
उन्होंने प्रणाली को चुनौती दी:
“यदि नेतृत्व पहाड़ में बसेगा,
तो व्यवस्था भी पहाड़ की तरफ ध्यान देगी।”
आज अधिकारी, बड़े उद्योगपति, और अब तो नेता भी मैदानों में बस रहे हैं।
तो फिर पहाड़ी गाँवों में कौन रहेगा?
कौन स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों की मांग करेगा?
किसकी आवाज़ उठेगी?
यही वजह है कि उन्होंने साफ कहा —
पहाड़ की बस्तियाँ खाली हो रही हैं और हम योजनाओं की फ़ाइलें गिन रहे हैं।
“पलायन रोको” सिर्फ नारा नहीं, परीक्षा है
शहज़ाद की बात से एक बात साफ हुई —
आज सरकारें पलायन रोकने के वादे के साथ आती हैं,
लेकिन ज़मीनी हकीकत उलटी है:
- पहाड़ में अस्पताल — डॉक्टर गायब
- स्कूल — शिक्षक गायब
- सड़कें — आधी-अधूरी
- रोजगार — सिर्फ घोषणाओं में
और सवाल वही —
जब सरकार भी पहाड़ छोड़कर मैदानों में घर बना ले,
तो फिर जनता किससे उम्मीद करे?
मदन (मदान) बिष्ट — पहाड़ बनाम मैदान (hill vs plains), स्वास्थ्य व बुनियादी सुविधा प्रश्न
मुख्य बातें (क्या कहा/पूछा):
- कांग्रेस विधायक मदन बिष्ट ने सदन में यह आरोप उठाया कि राज्य की नीतियों व नियम-निर्धारण में पहाड़ी इलाकों की मुश्किल भौगोलिक स्थिति को पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा, और नियम-प्रावधान आमतौर पर मैदान-केंद्रित बनाये जा रहे हैं।
- उन्होंने कई स्थानों पर स्वास्थ्य सेवाओं, विशेषकर CHC/PHC में डाक्टरों की कमी का उल्लेख किया — जैसे Dwarahat CHC में डॉक्टर न होना जबकि भवन/पहुँच मौजूद है; यही बात ग्रामीण/पहाड़ी क्षेत्रों के स्वास्थ्य-सेवा विफलता को उजागर करती है।
- पिछले सत्रों में भी उनकी टिप्पणियों के आसपास ‘पहाड़-मैदान’ विभाजन की बहसें रंदी गईं, और इन बहसों ने कभी-कभी गर्मागर्म बहसें तथा राजनैतिक विवाद छेड़ दिए।
आज उत्तराखंड विधानसभा में जो बातें उठीं, वो सिर्फ़ राजनीतिक बहसें नहीं थीं—ये पहाड़ की दबाई गई आवाज़ का बुलंद स्वर था। वर्षों से पहाड़ पलायन, पहचान और मूल-निवास की उलझनों में पिसता रहा, लेकिन सत्ता की नज़रों में ये मुद्दे “लोकल प्रॉब्लम” बनकर रह गए। मगर आज पहाड़ ने साफ कह दिया—हम पर्यटन पोस्टर नहीं, हम अपने अधिकारों वाले लोग हैं। नेताओं के वादों से नहीं, सवालों से बदलाव आता है, और आज पहाड़ ने सवाल पूछना शुरू कर दिया है। अब ये लड़ाई किसी पार्टी की नहीं, उत्तराखंड की असल पहचान और अस्तित्व की है। पहाड़ अब चुप नहीं रहेगा—क्योंकि जो आवाज़ आज उठी है, वो सिर्फ़ शब्द नहीं, आने वाले बदलाव की दस्तक है।
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