देहरादून, उत्तराखंड — 21 सितंबर 2025 को आयोजित UKSSSC (उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग) की परीक्षा में प्रश्नपत्र के तीन पन्ने परीक्षा शुरू होने के लगभग 30–35 मिनट बाद सोशल मीडिया पर फैलने लगे। इस अचानक लीक की खबर ने पूरे राज्य में छात्रों और युवा बेरोजगारों में गुस्सा भर दिया। देहरादून के परेड ग्राउंड में उत्तराखंड बेरोजगार संघ की अगुवाई में धरना शुरू हुआ, जिसमें छात्रों ने परीक्षा रद्द करने, पुनर्परीक्षा कराने, आयोग अध्यक्ष को बर्खास्त करने और CBI जांच कराने की मांग उठाई।
प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि परीक्षा व्यवस्था में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है; सरकार इसे “नकल” कह रही है, जबकि छात्रों का कहना है कि यह पेपर लीक है। सरकार ने पहले SIT (विशेष जांच दल) गठित किया है, कई अधिकारियों को निलंबित किया है, और मुख्य आरोपी खालिद मलिक तथा अन्य को गिरफ्तार किया गया है।
21 सितम्बर 2025 की घटना और छात्रों का विरोध
21 सितम्बर 2025 को देहरादून में आयोजित प्रतियोगी परीक्षा के दौरान अचानक विवाद खड़ा हो गया। छात्रों का आरोप था कि परीक्षा शुरू होने के कुछ ही समय बाद प्रश्नपत्र के पन्ने बाहर आ गए और सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।
- छात्रों का आरोप है कि परीक्षा शुरू होने के कुछ ही समय बाद प्रश्नपत्र के पन्ने बाहर आ गए और सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।
- सरकार की ओर से बयान आया कि यह पूरा पेपर लीक नहीं था, बल्कि पेपर के कुछ पन्ने ही पन्ने बहार आए और मुख्य आरोपी द्वारा नकल (cheating) करने की कोशिश थी।
- देहरादून के परेड ग्राउंड में छात्रों ने जोरदार धरना प्रदर्शन किया और परीक्षा रद्द करने, पुनर्परीक्षा कराने, और SIT/CBI जांच की मांग की।
उत्तराखंड नकल विरोधी कानून: पेपर लीक और नकल में अंतर (धाराओं सहित)
| अपराध का प्रकार | परिभाषा | शामिल माध्यम | लागू धारा (उत्तराखंड नकल विरोधी कानून, 2023) | सजा |
|---|---|---|---|---|
| नकल (Cheating) | परीक्षा के दौरान किसी अनुचित साधन का प्रयोग करना | पर्ची, मोबाइल, किसी और से मदद लेना, किसी को उत्तर देना | धारा 3(1), धारा 9 | पहली बार: 3 साल कैद + ₹5 लाख जुर्माना दोबारा: कम से कम 10 साल कैद + ₹10 लाख जुर्माना |
| पेपर लीक (Paper Leak) | प्रश्नपत्र को परीक्षा से पहले या दौरान बाहर भेजना या साझा करना | कागज़/प्रिंट, मोबाइल फोटो, ईमेल, व्हाट्सऐप, सोशल मीडिया, स्कैन/फोटो | धारा 3(2), धारा 10, धारा 11 | संगठित अपराध: आजीवन कारावास + ₹10 करोड़ जुर्माना |
| साजिश / सहयोग | नकल या पेपर लीक में किसी की मदद करना या साजिश करना | सभी माध्यम – मौखिक, लिखित, डिजिटल | धारा 4 | संगठित अपराध की तरह सजा: आजीवन कारावास + भारी जुर्माना |
| अनुचित साधन से लाभ | लीक/नकल से प्राप्त लाभ या संपत्ति | सभी माध्यम | धारा 8 | संपत्ति जब्ती + कानूनी कार्रवाई |
| प्रतिबंध (Debarment) | चार्जशीट दायर होने पर उम्मीदवार को परीक्षा से रोकना | – | अन्य संबंधित धाराएँ | 2–5 साल तक किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने से रोक |
टिप:
- इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (मोबाइल, ईमेल, व्हाट्सऐप, सोशल मीडिया) भी पेपर लीक की श्रेणी में आते हैं।
- आंशिक लीक भी कानून के अनुसार गंभीर अपराध है।
21 सितम्बर 2025 की घटना पर लागू कानून
सरकार ने 21 सितम्बर 2025 की घटना को “सिर्फ नकल” कहा है (यानी कुछ छात्रों ने कॉपी करने की कोशिश की, पूरा पेपर लीक नहीं हुआ)।
लेकिन कानून की परिभाषा (धारा 3(2)) के अनुसार –
यदि प्रश्नपत्र का एक भी हिस्सा परीक्षा के दौरान बाहर निकला और साझा किया गया, तो यह “पेपर लीक” और “अनुचित साधन” की श्रेणी में आता है।
यानी आंशिक लीक हो या पूरा पेपर लीक, दोनों ही कानून में गंभीर अपराध माने जाते हैं।
बेरोजगार संघ के अध्यक्ष राम कंडवाल की अगुवाई में पूरे प्रदेश में छात्रों और युवा बेरोजगारों द्वारा लगातार विभिन्न स्थानों पर प्रदर्शन जारी हैं; देहरादून से लेकर छोटे-बड़े जिलों तक छात्र सड़कों पर उतरकर अपनी नाराज़गी और मांगें रख रहे हैं और इस आंदोलन को व्यापक समर्थन मिल रहा है। इसी क्रम में उत्तराखंड क्रांति दल ने भी देहरादून व अन्य जिलों में इस प्रकरण का जोरदार विरोध दर्ज कराया है और पार्टी के कार्यकर्ता व स्थानीय लोग लगातार रैलियाँ व धरने कर रहे हैं। इसके अलावा स्वाभिमान मोर्चा के अध्यक्ष बोबी पंवार और उपाध्यक्ष त्रिवुवन चौहान भी पहले दिन से ही देहरादून में लगातार डटे हुए हैं, मंचों पर छात्रों को समर्थन दे रहे हैं और प्रेसवक्ताओं के जरिए सरकार पर ज़वाबदेही का दबाव बना रहे हैं।
दूसरी ओर सरकार के कुछ मंत्रियों और कई बीजेपी नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके माना है कि यह विरोध-प्रदर्शन अब राजनीतिक रंग ले चुका है और कुछ नेता तथा संगठन इसे अपनी राजनीति चमकाने का साधन बना रहे हैं; उन्होंने आंदोलन में राजनीतिक पहुँच और दलगत हितों के प्रभाव का आरोप भी लगाया। हर तरफ नेताओं, सामाजिक संगठनों और छात्रनायकों के तरफ़ से बयानबाज़ी लगातार चल रही है और मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर छाया हुआ है, परंतु अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिख रहा कि कोई पक्ष पीछे हटने को तैयार है—न छात्र अपनी मांगों से समझौता करना चाहते हैं और न ही सरकार अपनी स्थिति बदलने को उत्सुक है। आंदोलन के मंच से कुछ वक्तों पर नेपाल जैसी घटनाओं का संदर्भ भी आया, जिसने माहौल को और संवेदनशील बना दिया और सियासी प्रतिक्रिया को तेज कर दिया; इस पर मुख्यमंत्री ने भी अपनी टिप्पणी दी और विवादित शब्दावली का प्रयोग करके इसे “नक़ल जिहाद” कहकर संबोधित किया, जिससे नई बहस और तीखी प्रतिक्रिया भड़क उठी। इन सभी बयानों और प्रतिक्रियाओं ने सार्वजनिक बहस को और गहरा कर दिया है—छात्र अपनी परीक्षा रद्द करने और सख्त जांच की मांग पर अड़े हैं जबकि सरकार जांच का आश्वासन देते हुए फिलहाल पुनः परीक्षा कराने से ठहराव बनाए हुए है—और इस तरह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, मीडिया की नज़र और सड़क पर जारी आंदोलन ने पूरे प्रकरण को कानून, नीति और जनहित के परिप्रेक्ष्य में एक जटिल एवं गर्मागर्म मुद्दा बना दिया है।








