पहाड़ी माइक ब्यूरो: दिवाकर भट्ट उत्तराखंड आंदोलन के अग्रिम नेता थे, जिन्होंने BHEL की नौकरी छोड़कर अपना पूरा जीवन राज्य और जनता के लिए संघर्ष में लगाया। खैट पर्वत आंदोलन से लेकर भू-कानून और राजस्व सुधारों तक, उन्होंने महत्वपूर्ण और दूरदर्शी फैसले लिए। निजी दुख, राजनीतिक उपेक्षा और 2025 में उनके निधन के बावजूद, उनका योगदान आज भी उत्तराखंड की पहाड़ी पहचान और आंदोलन की आत्मा बना हुआ है।
Highlights
- BHEL कर्मचारी → यूनियन नेता → उत्तराखंड आंदोलन के फील्ड-मार्शल।
- नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक आंदोलनकारी बनने का ऐतिहासिक निर्णय।
- खैट पर्वत, श्रीनगर और दिल्ली में बड़े प्रदर्शनों का नेतृत्व।
- भू-कानून (250 sqm) और राजस्व सुधारों में बड़ा योगदान।
- 2002 में पत्नी की दुखद आत्महत्या ने परिवार को तोड़ा।
- 25 नवंबर 2025 को निधन—राज्य ने अपना जुझारू नेता खो दिया।
बचपन और शिक्षा — पहाड़ी जीवन की कठिनाइयों से निकला संघर्षशील व्यक्तित्व
दिवाकर भट्ट का जन्म 1 अगस्त 1946 के आसपास (स्थानीय रिकॉर्ड) टिहरी गढ़वाल के एक सामान्य परिवार में हुआ। गरीबी, संसाधनों की कमी और पहाड़ के प्राकृतिक संघर्ष—इन्हीं ने भट्ट में संयम, अनुशासन और मेहनत का भाव पैदा किया।
उन्होंने स्कूलिंग स्थानीय सरकारी विद्यालयों में की और आगे तकनीकी अध्ययन किया, जिसने उन्हें बाद में BHEL में नौकरी पाने में सक्षम बनाया।
स्थानीय संस्कृति और पर्वतीय संघर्षों ने उनके भीतर “समुदाय-पहले” वाला दृष्टिकोण विकसित किया, जो आगे चलकर आंदोलन की रीढ़ साबित हुआ।
नौकरी और करियर — BHEL से यूनियन नेता बनने तक
दिवाकर भट्ट ने 1970s–80s में BHEL (भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड), हरिद्वार में नौकरी की। यह तथ्य कई स्थानीय प्रोफाइलों और स्मृति-लेखों में दर्ज है।
BHEL यूनियन आंदोलन के प्रमुख पहलू:
- कर्मचारियों की सुरक्षा और चिकित्सा सुविधाओं के लिए संघर्ष
- वेतन सुधार व शिफ्ट नीति पर बहस
- श्रमिक अधिकारों के लिए रैलियों का नेतृत्व
- प्रबंधन के साथ वार्ता और समझौते
यहीं से भट्ट ने तीन महत्वपूर्ण कौशल सीखे—
(1) जनसंगठन, (2) बातचीत/नेगोशिएशन, (3) प्रशासनिक दबाव में काम करना।
ये वही कौशल थे जिन्होंने उन्हें आगे उत्तराखंड आंदोलन का मजबूत कमांडर बनाया।
नौकरी छोड़ना — बड़ा निर्णय
भट्ट की पत्नी ने कई बार नौकरी न छोड़ने की सलाह दी, लेकिन दिवाकर भट्ट ने उत्तराखंड आंदोलन को अधिक महत्वपूर्ण माना और नौकरी छोड़ दी।
यह तथ्य स्थानीय वृत्तांतों में व्यापक रूप से दर्ज है।
संघर्ष के निर्णायक आंदोलन — खैट पर्वत, श्रीयंत्र टापू, जंतर-मंतर, देहरादून मार्च, ग्रामीण आंदोलन

खैट पर्वत आंदोलन (1994–95) — राज्य आंदोलन का सबसे ऐतिहासिक मोड़
खैट पर्वत (टिहरी गढ़वाल) में हुआ आंदोलन स्थानीय इतिहास में उत्तराखंड आंदोलन का “टर्निंग पॉइंट” माना जाता है।
यहाँ दिवाकर भट्ट ने अनशन और लंबे धरनों का नेतृत्व किया।
इस आंदोलन की विशेषताएँ:
- हजारों ग्रामीणों और युवाओं की भागीदारी
- कई चरणों में धरना और अनशन
- प्रशासनिक दमन और लाठीचार्ज
- आंदोलन को पूरा गढ़वाल संभाग में फैलाना
कई स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार खैट पर्वत के संघर्ष ने दिवाकर भट्ट को
“Field Marshal of Uttarakhand Movement”
की उपाधि दिलाई।
श्रीयंत्र टापू आंदोलन (1994)
श्रीनगर (गढ़वाल) का यह प्रदर्शन विश्वविद्यालय-क्षेत्र और आसपास के गाँवों में जागरूकता फैलाने वाला प्रमुख आंदोलन था।
यहाँ दिवाकर भट्ट के भाषण ने युवाओं, व्यापारियों और किसानों को बड़े पैमाने पर जोड़ा।
✔ इस आंदोलन ने गढ़वाल के 50+ गांवों को राज्य आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल किया।
दिल्ली जंतर-मंतर आंदोलन (1995)
1995 में जब आंदोलन दिल्ली पहुँचा, दिवाकर भट्ट ने जंतर-मंतर पर पहाड़ की समस्याओं को केंद्र सरकार के सामने रखा।
भारतीय मीडिया में यह पहला बड़ा मौका था जब उत्तराखंड आंदोलन को राष्ट्रीय स्पेस मिला।
✔ इस आंदोलन को 15 जनवरी 1995 के आसपास दर्ज किया जाता है।
✔ मुद्दे — पलायन, सड़क, स्वास्थ्य, संसाधनों का शोषण।
हरिद्वार–देहरादून मार्च (1995)
इस पदयात्रा में हजारों लोग हरिद्वार से देहरादून तक पैदल चले।
रिपोर्ट्स के अनुसार देहरादून पहुँचते-पहुँचते भीड़ 20,000+ तक पहुँच चुकी थी।
✔ यह मार्च सरकार और मीडिया दोनों का ध्यान खींचने में सफल रहा।
ग्रामीण जन-आंदोलन (1996–2000)
1996–2000 के बीच दिवाकर भट्ट और UKD के कार्यकर्ताओं ने 200+ गांवों में सभाएँ कीं—
नारायणखाल, चौरास, धुमाकोट, चिन्यालीसौड़, पोखरी, धनोल्टी जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में।
✔ इन ग्रामीण सभाओं ने आंदोलन को वास्तविक जनाधार दिया।
✔ यही असली ऊर्जा थी जिसने राज्य निर्माण की नींव मजबूत की।
उत्तराखंड बनने के बाद (2000) — दिवाकर भट्ट का मंत्रीकाल और नीति-निर्माण (सत्यापित संदर्भ)
2007 में दिवाकर भट्ट ने विधानसभा चुनाव लड़ा और वे विधायक बने।
उनका नाम राजस्व विभाग से जुड़े कार्यों में प्रमुखता से आता है।
1. भूमि-सुरक्षा नीति (250 sqm नियम) — सत्यापित संदर्भ
उत्तराखंड में 2003–2007 के दौरान भूमि खरीद पर प्रतिबंध/नियंत्रण के कई चरण आए।
भट्ट इस नीति के प्रमुख समर्थक रहे।
250 sqm वाली सीमा का कठोर संस्करण 2007 के आसपास लागू/पुनः लागू करवाया गया, जिससे पहाड़ की भूमि बाहरी दखल से सुरक्षित रहे।
रिपोर्ट्स में भूमि-सुरक्षा को भट्ट का प्रमुख काम बताया गया है।
2. पटवारियों को ‘राजस्व पुलिस’ अधिकार
पहाड़ी इलाकों की अनूठी व्यवस्था (Revenue Police System) में भट्ट ने सुधार किए—
पटवारियों के अधिकारों को औपचारिक रूप दिया गया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में त्वरित कार्रवाई संभव हुई।
(यह दावा स्थानीय रिपोर्टों और वरिष्ठ पत्रकारों के विश्लेषण में दर्ज है)।
पत्नी की आत्महत्या (राष्ट्रीय मीडिया स्रोत)
सबसे संवेदनशील तथ्य—
Times of India, Rediff, और उस समय के PTI रिपोर्ट्स के अनुसार:
दिवाकर भट्ट की पत्नी ने चुनाव परिणाम (फरवरी 2002) के बाद आत्महत्या कर ली।
✔ पुलिस रिपोर्ट में आत्महत्या की पुष्टि थी।
✔ यह भट्ट के जीवन की सबसे बड़ी व्यक्तिगत त्रासदी बनी।
निरंतर संघर्ष — राज्य बनने के बाद (2000–2025)
राज्य बनने के बाद भी दिवाकर भट्ट ने संघर्ष जारी रखा।
वे लगातार इन मुद्दों पर आवाज़ उठाते रहे—
- पलायन
- रोजगार
- पर्यावरण और वन संरक्षण
- जल–जंगल–जमीन
- स्वास्थ्य और स्कूल
- टिहरी बांध विस्थापन
- आंदोलनकारी पहचान
वे कहते थे—
“राज्य बनना लक्ष्य नहीं, शुरुआत है।”
उनकी यही सोच उन्हें पहाड़ के लिए लगातार सक्रिय रखती थी।
राजनीतिक करियर — UKD और अन्य दलों के साथ भूमिका
दिवाकर भट्ट UKD के केंद्रीय नेताओं में रहे।
उनका राजनीतिक करियर इस प्रकार है:
- UKD केंद्रीय अध्यक्ष
- विधानसभा चुनाव 2002 — लड़े
- 2007 — चुनाव जीता
- 2012 — फिर चुनाव लड़ा
उन्होंने कभी राजनीति को व्यवसाय नहीं बनाया—
उनकी राजनीति आंदोलन और जनहित पर आधारित थी।
दिवाकर भट्ट का निधन — 25 नवंबर 2025
दिवाकर भट्ट का निधन 25 नवंबर 2025 को हरिद्वार में हुआ।
✔ राज्य सरकार ने उन्हें राजकीय सम्मान दिया।
✔ उनके अंतिम संस्कार में हजारों लोग उपस्थित थे।
सत्यापन के साथ अंतिम निष्कर्ष
दिवाकर भट्ट का जीवन उन दुर्लभ उदाहरणों में से एक है जहाँ—
नेता पद से नहीं, संघर्ष से बनता है।
उन्होंने:
- नौकरी छोड़ी
- परिवार की त्रासदी झेली
- आंदोलन का नेतृत्व किया
- नीति बनाई
- और मृत्यु तक पहाड़ के लिए लड़ते रहे
उनका योगदान भले इतिहास की किताबों में कम लिखा गया हो,
लेकिन पहाड़ की आत्मा में उनका नाम हमेशा रहेगा।
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