मुख्य शीर्षक: उत्तराखंड स्थापना दिवस, 9 नवंबर 2000, उत्तराखंड आंदोलन का इतिहास, उत्तराखंड के शहीद, खटीमा-मसूरी कांड, रामपुर तिराहा कांड। 62 वर्षों के संघर्ष, शहादत, और आंदोलन से जन्मा उत्तराखंड।
आज, जब हम देवभूमि उत्तराखंड की खुली हवा में सांस लेते हैं, तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि इस राज्य का अस्तित्व दशकों के लंबे संघर्ष, अनगिनत बलिदानों और अटूट संकल्प का परिणाम है।
आज का उत्तराखंड — सपनों का राज्य या अधूरी कहानी?
25 साल बाद भी सवाल वही है —
क्या हम शहीदों के सपनों वाला उत्तराखंड बना पाए हैं?
- पलायन अब भी जारी है।
- गाँव खाली हो रहे हैं।
- राज्य निर्माण के 25 बाद भी प्रदेश की कोई स्थायी राजधानी नही है।
- शिक्षा और स्वास्थ्य की लचर व्यवस्थाएं है।
- आए दिन भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं।
- देश का पहला और आखिरी राज्य जो मूल निवास नही देता।
- और युवा आज भी नौकरी के लिए मैदानों की ओर जा रहा है।
उत्तराखंड राज्य बनने की कहानी, विस्तार से:-
शुरुआत — वो दिन जब पहाड़ गरजा था
कल्पना कीजिए, देहरादून से लेकर पिथौरागढ़ तक, हर गांव, हर घाटी में एक ही नारा गूंज रहा था —
“कोदा झंगोरा खाएंगे उत्तराखंड बनाएंगे”!” यह 1990 का दशक था। सड़कें टूटी हुई थीं, रोजगार नहीं था, सरकारी दफ्तरों में पहाड़ी आवाजें दबा दी जाती थीं। दिल्ली और लखनऊ से नीतियाँ बनतीं, लेकिन पहाड़ के गाँव तक पहुंचते-पहुंचते बस उम्मीदें रह जाती थीं।
लोग थक चुके थे।
और जब उम्मीद टूटती है — तब आंदोलन जन्म लेता है।
कैसे शुरू हुआ उत्तराखंड आंदोलन
इस आंदोलन की शुरुआत कोई एक घटना नहीं थी, बल्कि यह पहाड़ों की सामूहिक पीड़ा का विस्फोट था।
1979 में “उत्तराखंड क्रांति दल” (UKD) बना। मकसद साफ था — अलग पहाड़ी राज्य की मांग।
1990 के दशक में यह आंदोलन सड़कों पर उतर आया। छात्र, महिलाएं, किसान, कर्मचारी — सब एकजुट हो गए। गांव-गांव में मशाल जली, झंडे उठे, और नारे गूंजे —
“उत्तराखंड दो, अभी दो”
1994: जब आंदोलन ने आग पकड़ी

1994 का साल आंदोलन का Turning Point था।
तीन घटनाएँ इतिहास में दर्ज हो गईं — खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा।
1 खटीमा गोलीकांड — 1 सितंबर 1994
उधम सिंह नगर के खटीमा (Khatima) में एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन रैली पर पुलिस ने बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं।
प्रातप सिंह, भगवन सिंह सीरौला, परमेज़ित सिंह जैसे नौजवान शहीद हो गए।
यह दमन चक्र की शुरुआत थी, इन गोलियों से आंदोलन नहीं टूटा, बल्कि और भड़क उठा।
2 मसूरी गोलीकांड — 2 सितंबर 1994
खटीमा कांड के विरोध में अगले ही दिन, मसूरी में झूलाघर के पास पुलिस ने भीड़ पर फायरिंग की।
पुलिस उपाधीक्षक उमाकांत त्रिपाठी सहित बालबीर सिंह नेगी, बेलमती चौहान, हंसा धानई जैसी माताएँ-बहनें शहीद हुईं।
उनकी चीखें आज भी पहाड़ों की हवा में गूंजती हैं।
3 तिराहा रामपुर कांड — 1-2 अक्टूबर 1994
- यह उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। 1 अक्टूबर 1994 की रात को, दिल्ली में होने वाली रैली में शामिल होने के लिए जा रही बसों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर रोक लिया गया।
- वहां पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर कहर बरपाया। उन पर गोलियां चलाई गईं, लाठीचार्ज किया गया और महिला आंदोलनकारियों के साथ घोर अत्याचार और यौन उत्पीड़न किया गया।
- इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया और राज्य की मांग को और भी प्रबल बना दिया।
यह कांड उत्तराखंड आंदोलन की चेतना बन गया।
अब हर पहाड़ी जान गया था — “अब पीछे नहीं हटना है।”
उत्तराखंड आन्दोलन से जुड़े कुछ मुख्य नाम-
इस आंदोलन को सफल बनाने में अनगिनत लोगों ने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। कुछ प्रमुख नाम हमेशा इतिहास में अमर रहेंगे।
- इंद्रमणि बडोनी: उन्हें ‘उत्तराखंड का गांधी’ कहा जाता है। उन्होंने इस आंदोलन को एक शांतिपूर्ण और संगठित दिशा दी।
- काशी सिंह ऐरी: उत्तराखंड क्रांति दल के प्रमुख नेताओं में से एक, जिन्होंने आंदोलन को राजनीतिक मंच पर जीवित रखा।
- बच्छी सिंह चौहान: उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के प्रमुख नेता।
- आम जनता: इस आंदोलन की असली ताकत यहां के छात्र, महिलाएं, कर्मचारी, पूर्व सैनिक और आम नागरिक थे, जिन्होंने बिना किसी स्वार्थ के इस लड़ाई को लड़ा।
| नाम | भूमिका / टिप्पणी |
|---|---|
| भगवन सिंह सीरौला | खटीमा गोलीकाण्ड के शहीद। |
| प्रातप सिंह | खटीमा गोलीकाण्ड के शहीद। |
| सलीम अहमद | खटीमा गोलीकाण्ड में मृत। |
| गोपीचन्द | खटीमा गोलीकाण्ड के शहीद। |
| धर्मानन्द भट्ट | खटीमा गोलीकाण्ड के शहीद। |
| परमजीत सिंह | खटीमा गोलीकाण्ड के शहीद। |
| रामपाल | खटीमा गोलीकाण्ड में मृत। |
| बेलमती चौहान | मसूरी गोलीकाण्ड की शहीद महिला। |
| हंसा धनई | मसूरी गोलीकाण्ड की शहीद महिला। |
| बलबीर सिंह नेगी | मसूरी गोलीकाण्ड में शहीद युवक। |
| राय सिंह बंगारी | मसूरी गोलीकाण्ड में शहीद। |
| मदन मोहन ममगाईं | मसूरी गोलीकाण्ड के शहीद। |
| धनपत सिंह | मसूरी गोलीकाण्ड में मृत। |
| सूर्यप्रकाश थपलियाल | रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड के शहीद। |
| राजेश लखेड़ा | रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड में शहीद। |
| रवीन्द्र सिंह रावत | रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड में शहीद। |
| राजेश नेगी | रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड का शहीद। |
| सतेन्द्र चौहान | रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड में शहीद (16 वर्ष)। |
| गिरीश भद्री | रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड में शहीद। |
| अशोक कुमार कैशिव | रामपुर तिराहा गोलीकाण्ड के शहीद। |
| बलवन्त सिंह जगवाण | देहरादून गोलीकाण्ड के शहीद। |
| दीपक वालिया | देहरादून गोलीकाण्ड के शहीद। |
| राजेश रावत | देहरादून गोलीकाण्ड के शहीद। |
| राकेश देवरानी | कोटद्वार काण्ड में शहीद। |
| पृथ्वी सिंह बिष्ट | कोटद्वार काण्ड में शहीद। |
| राजेश रावत (श्रीयन्त्र टापू) | श्रीयन्त्र टापू काण्ड के शहीद। |
| यशोधर बेंजवाल | श्रीयन्त्र टापू काण्ड के शहीद। |
| गिरीश तिवारी “गिरदा” | आंदोलन के साहित्य-संगीत से जुड़े सक्रिय कार्यकर्ता |
| नरेंद्र सिंह नेगी | आंदोलन में जनजागरण के गीतों के माध्यम से सक्रिय योगदान। |
| बेलमती चौहान | (दोहराया गया) आंदोलन में महिला शक्ति का प्रतीक। |
| हंसा धनई | (दोहराया गया) महिला आंदोलनकर्ता। |
| चंडी प्रसाद भट्ट | आंदोलनकारी, साहित्य-संगीत सक्रिय। |
| सचिदानंद भारती | ‘पानी राखो’ जैसे स्थानीय आंदोलन के प्रवर्तक। |
स्रोत: जिला-प्रशासन द्वारा जारी आंदोलनकारियों की सूची।
नोट: अनेक स्थानीय नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और अज्ञात कार्यकर्ताओं ने गांव-स्तर पर नेतृत्व किया; आंदोलन व्यापक और बहु-केंद्रीय स्वरूप का था।
प्रमुख संगठन:
- उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी)
- उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी
- उत्तराखंड जनता संघर्ष मोर्चा
आन्दोलन का जनजागरण और ‘गढ़रत्न’ नरेंद्र सिंह नेगी जी का अमर गीत
उत्तराखंड राज्य आन्दोलन केवल राजनीतिक नहीं था — यह एक जन-चेतना की लहर थी। इस आन्दोलन को गाँव-गाँव तक पहुँचाने में संगीत और लोकसंस्कृति का अभूतपूर्व योगदान रहा। इसी दौर में गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी का वह जोशीला गीत “उठा जागा उत्तराखंडियों, सौ उठौना कु वक्त ऐ गे” (Utha Jaga Uttarakhandiyo, Sau Uthauna Ku Waqt Aigya) एक जनघोषणा बन गया।
यह गीत साल 1994 के आसपास आंदोलन के चरम समय में रिकॉर्ड किया गया था, जब मुज़फ्फरनगर, खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा जैसी घटनाओं ने प्रदेश को झकझोर कर रख दिया था।
नेगी जी के इस गीत ने जैसे ठंडी घाटियों में आग भर दी —
लोग अपने गाँवों से निकल पड़े, युवा रातों को मशाल लेकर चौक-चौराहों पर गाने लगे, महिलाएँ भी “उठा जागा” के स्वर में स्वर मिलाने लगीं। यह गीत आन्दोलन का सांस्कृतिक घोषणापत्र बन गया।
इसने न केवल जनमानस को झकझोरा बल्कि “उत्तराखंड राज्य निर्माण” की माँग को एक साझा जनभावना में बदल दिया।
राज्य गठन की प्रक्रिया
- 27 जुलाई 2000 को केन्द्र सरकार ने Uttar Pradesh Reorganisation Bill, 2000 लोकसभा में प्रस्तुत किया।
- 1 अगस्त 2000 को लोकसभा ने पारित किया और 10 अगस्त को राज्यसभा ने।
- 28 अगस्त 2000 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली।
और आखिरकार… 9 नवंबर 2000
साल 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने Uttar Pradesh Reorganisation Act पारित किया।
28 अगस्त को राष्ट्रपति ने बिल पर हस्ताक्षर किए।
और 9 नवंबर 2000 को भारत का 27वां राज्य “उत्तरांचल” अस्तित्व में आया।
(2007 में इसका नाम बदलकर उत्तराखंड रखा गया।)
- प्रथम राज्यपाल: सुरजीत सिंह बरनाला
- प्रथम मुख्यमंत्री: नित्यानंद स्वामी
यह सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं था — यह पहाड़ की आत्मा का पुनर्जन्म था।
पहाड़ की आवाज़
“यह राज्य किसी सरकार की देन नहीं है, यह राज्य उन माँओं का आशीर्वाद है जिन्होंने अपने बेटों को खोकर भी ‘जय उत्तराखंड’ कहा।”
उत्तराखंड स्थापना दिवस केवल जश्न मनाने का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्म-चिंतन का भी दिन है। यह हमें उन सपनों को याद दिलाता है जिनके लिए यह राज्य बनाया गया था – पहाड़ों का विकास, पलायन की रोकथाम, अपनी संस्कृति का संरक्षण और एक आत्मनिर्भर एवं समृद्ध उत्तराखंड का निर्माण।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के सभी अमर शहीदों और आंदोलनकारियों को शत-शत नमन।
जय उत्तराखंड — जय पहाड़!
— पहाड़ी माइक सार
देहरादून और उत्तराखंड में भूमि की कीमतों में वृद्धि: नए सर्किल रेट 2025
उत्तराखंड राज्य कब बना था?
उत्तराखंड का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ था। यह राज्य उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 (Uttar Pradesh Reorganisation Act 2000) के तहत अलग किया गया था।
उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश से अलग क्यों किया गया?
कई वर्षों से विकास की कमी, बेरोजगारी, पलायन और प्रशासनिक उपेक्षा के कारण लोगों ने अलग राज्य की मांग की, ताकि पहाड़ों की समस्याओं का समाधान हो सके।
उत्तराखंड आंदोलन के प्रमुख नेता कौन थे?
आंदोलन के मुख्य नेताओं में इंद्रमणि बडोनी, डॉ. शमशेर सिंह बिष्ट, दिवाकर भट्ट, सुंदरलाल बहुगुणा और हजारों छात्र, महिलाएं व ग्रामीण कार्यकर्ता शामिल थे।
उत्तराखंड आंदोलन के प्रमुख घटनाक्रम कौन-कौन से थे?
मुख्य घटनाएं थीं — खटीमा गोलीकांड (1 सितंबर 1994), मसूरी गोलीकांड (2 सितंबर 1994) और रैम्पुर तिराहा कांड (1–2 अक्टूबर 1994)। इन घटनाओं ने आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया।
नरेंद्र सिंह नेगी के गीत ने आंदोलन में क्या भूमिका निभाई?
गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी का गीत
“उठा जागा उत्तराखंडियों, सौ उठौना कु वक्त ऐ गे” (1994)
आंदोलन की आवाज़ और ऊर्जा बन गया। इस गीत ने पूरे पहाड़ को जागरूक और एकजुट कर दिया।
उत्तराखंड का शुरुआती नाम क्या था?
जब 2000 में राज्य बना, तब इसका नाम उत्तरांचल (Uttaranchal) रखा गया था। बाद में 2007 में इसका नाम बदलकर “उत्तराखंड” कर दिया गया।
उत्तराखंड स्थापना दिवस कब और कैसे मनाया जाता है?
हर साल 9 नवंबर को पूरे राज्य में उत्तराखंड स्थापना दिवस (Uttarakhand Foundation Day) के रूप में मनाया जाता है, शहीदों और आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि दी जाती है।






