ऋषिकेश शराब दुकान विवाद: हत्या, अतिक्रमण, विरोध और सरकार की नीति—तीर्थनगरी में शराब पर बढ़ा घेरा

ऋषिकेश शराब दुकान विवाद rishikesh wine shop

उत्तराखंड की आध्यात्मिक राजधानी, अंतरराष्ट्रीय योग हब और चारधाम यात्रा का प्रवेशद्वार—ऋषिकेश। उत्तराखंड के ऋषिकेश (मुनि की रेती, खारा स्रोत) में शराब दुकान के खिलाफ हत्या, अतिक्रमण और लोगों के धरने-प्रदर्शन के बीच बन रही तस्वीर। नीति तो है- लेकिन अमल कहां? जानें पूरी कहानी विस्तार से।

आबकारी नीति 2025–26 में साफ़-साफ़ लिखा है कि मंदिर, आश्रम और धार्मिक स्थलों के पास शराब की दुकानें नहीं होंगी, और राज्य ने ऋषिकेश-हरिद्वार को मद्य-निषेध क्षेत्र के रूप में और सख़्ती से लागू करने की बात कही है। यानी कागज़ पर व्यवस्था बिल्कुल स्पष्ट थी। लेकिन ज़मीन पर क्या हुआ? न सिर्फ़ ठेका खुला रहा, बल्कि जांच में यह भी सामने आया कि दुकान ने 214 वर्ग मीटर से अधिक सरकारी भूमि पर अवैध अतिक्रमण कर रखा था—और फिर भी प्रशासन वर्षों तक खामोश बैठा रहा।

यह कोई मामूली विसंगति नहीं; यह सिस्टम की गहरी विफलता और संभवतः प्रभावशाली हितों की सुरक्षा का संकेत है। इसका मतलब सिर्फ़ यह नहीं कि नियम कमजोर हैं—बल्कि यह कि नीति भले ही किताबों में चमकदार दिखती हो, पर उसे लागू कराने का साहस, राजनीतिक इच्छा-शक्ति और जवाबदेही का ढांचा जमीनी स्तर पर लगभग गायब है।

घटना-शुरुआत: मामूली विवाद से खौफनाक हत्या

दिनांक 25 अक्टूबर 2025 की देर रात, खारा स्रोत स्थित शराब दुकान के पास दो दोस्त मौजूद थे — 28 वर्षीय अजेंद्र कंडारी और उसके पड़ोसी मित्र अक्षय ठाकुर। दोनों ने शराब पी थी, फिर किसी बात पर नाराज़गी इतनी बढ़ी कि अक्षय ने चाकू से अजेंद्र पर कई वार कर दिए। अजेंद्र लहूलुहान हालत में गिर पड़ा; अस्पताल ले जाते समय उसकी मौत हो गई।
हत्याकांड ने स्थानीय लोगों में गहरा आक्रोश भड़काया और मामला तुरंत सामाजिक-राजनीतिक संग्राम में बदल गया।

विरोध प्रदर्शन: लोगों ने उठाई दुकान हटाए जाने की मांग

हत्या के अगले दिन-दोपहर से ही स्थानीय संगठनों और प्रदर्शनकारियों ने ठेका के बाहर धरना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि “जब तक ठेका नहीं हटेगा, हमारा धरना नहीं टूटेगा।”
दिनांक 30 अक्टूबर 2025 को यह आंदोलन तीसरे दिन भी जारी रहा और ठेका बंद रहा।
8वें दिन प्रदर्शनकारियों ने जुलूस निकाला, पुतला फूंका।

ओम गोपाल रावत (पूर्व विधायक) — बिल्कुल स्पष्ट व आक्रामक:
“शराब की दुकान हटने तक आंदोलन को जारी रखा जाएगा। किसी भी कीमत पर खारा स्रोत में शराब की दुकान चलने नहीं दी जाएगी। प्रशासन के लिखित आश्वासन के बावजूद दुकान संचालित की जा रही है — यह सरकार और प्रशासन का दोहरा चेहरा उजागर करने के लिए काफी है।”

दिनेश चंद्र मास्टर– “यह दुकान हटनी ही होगी ताकि कोई दूसरी घटना न हो; हम पीछे नहीं हटेंगे।”

अवैध अतिक्रमण का खुलासा: नीति की धज्जियाँ बताएंगे

जब मामला गहराया, तो एक और बड़ा सच सामने आया — राजस्व विभाग की जांच में पाया गया कि दुकान संचालक ने 214 वर्ग मीटर से अधिक भू-भाग पर अवैध कब्जा किया हुआ था, जबकि आवंटन उससे कम था।
दिनांक 31 अक्टूबर 2025 को तहसील की ओर से नोटिस जारी हुआ जिसमें अतिक्रमण हटाने का निर्देश था।
एसडीएम आशिष घिल्डियाल ने स्पष्ट किया कि यह मामला तहसील स्तर तक सीमित नहीं है — “शासनादेश आने पर उसकी पालना सुनिश्चित होगी।”

सरकार की नीति vs हकीकत: धर्मनगरी में सवाल उठे

राज्य की आबकारी नीति (2025-26) में एकमत है – मंदिरों, आश्रमों, धार्मिक स्थलों के पास शराब दुकानें नहीं होंगी; साथ ही ऋषिकेश/हरिद्वार में “मद्य निषेध क्षेत्र” विस्तार की बात कही गई थी।
फिर भी, इस तरह की दुकानें चल रही हैं, पुलिस-आबकारी टीम उन्हें किसलिए संरक्षित कर रही है?
यह सिर्फ नियम का उल्लंघन नहीं — यह जनता की आस्था, प्रशासन की जवाबदेही और नीति-प्रवर्तन का प्रश्न है।

ऋषिकेश शराब दुकान अनुज्ञापी का बयान

ठेके के संचालक के नाम के रूप में मीडिया/सोशल पोस्टों में अरविंद राणावत / अरविंद रणावत (Arvind Ranawat) का उल्लेख मिलता है। उन्होंने स्थानीय मीडिया के सामने अपना पक्ष रखा और कहा:

“हमने लाइसेंस लिया था, हम नियमों के अनुसार काम करते रहे — हमारी इकलौती आजीविका पर प्रश्न उठाना ठीक नहीं है। प्रशासन के नोटिस आने पर हम सहयोग कर रहे हैं और जहां भी गैरकानूनी कुछ पाया गया, हम सुधार करेंगे। कुछ लोग गलत माहौल बना रहे हैं और हमारा व्यापार बदनाम कर रहे हैं।”

पहाड़ी माइक सार

यह वही हरिद्वार और ऋषिकेश हैं जिन्हें हम दुनिया को “धर्मनगरी”, “योग राजधानी”, और “आध्यात्मिक धरोहर” कह-कर गर्व से दिखाते हैं। यहां लोग शराब नहीं, गंगाजल की बूंदें हाथ में लेकर आते हैं। लेकिन आज तस्वीर ऐसी है कि धार्मिक ध्वनियों के बीच, ठेके के बोर्ड चमक रहे हैं। सरकार अपनी आबकारी नीति में साफ लिखती है — “धार्मिक क्षेत्रों में शराब वर्जित होगी।” फिर सवाल उठता है:

किसके आशीर्वाद से ये दुकानें चल रही हैं?
किस ऑफिस में फाइलें “नीति” बनती हैं और किस टेबल पर “अपवाद” तैयार होते हैं?

ये केवल शराब की दुकानें नहीं हैं —
ये उस सिस्टम का प्रतीक हैं जो जनता को संस्कार सिखाता है और खुद मुनाफ़े में डूबा है।

लोग पूछ रहे हैं — क्या यहां धर्म बिक रहा है?
या फिर धर्म को ढाल बनाकर शराब का व्यापार हो रहा है?

क्योंकि जनता भक्ति करती है, प्रशासन नीति-पाठ पढ़ता है,
और मुनाफ़ा अपनी पूरी आस्था से वसूला जाता है।

असली सवाल यही है —
क्या ये कानून धरातल पर भी लागू है या सिर्फ सरकारी PDF में?

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