“भिक्षा से शिक्षा तक: प्रशासन की वो पहल जिसने सड़कों पर बिखरे बचपन को नई पहचान दी”

भिक्षा से शिक्षा तक

देहरादून — जिला प्रशासन की एक व्यापक पहल ने शहर की सड़कों पर भिखारियों के रूप में जीवन यापन कर रहे बच्चों को शिक्षा और संरक्षण की ओर वापस लाना शुरू कर दिया है। इस अभियान के तहत रेस्क्यू, पुनर्वास और पढ़ाई-जुड़ने की कार्यवाही तेज़ी से की जा रही है, जिससे बच्चे अब भिक्षा नहीं बल्कि स्कूल की बेंच तक पहुँच रहे हैं।

कभी सिग्नल पर हाथ फैलाने वाले बच्चे आज किताबें थामे स्कूल जा रहे हैं। सवाल यही है — अगर देहरादून में मुमकिन है, तो बाकी जगह क्यों नहीं?

जब सिस्टम ने बच्चों को सिर्फ “भिखारी” नहीं, “विद्यार्थी” देखा

कभी जिन बच्चों के हाथों में भीख का कटोरा था, आज वही बच्चे किताबें और पेंसिल पकड़े स्कूल जा रहे हैं।
देहरादून प्रशासन की इस ऐतिहासिक पहल “भिक्षा से शिक्षा” ने समाज को एक नई दिशा दी है — यह दिखाया है कि जब सिस्टम सही इरादे से काम करे, तो सड़कों पर बिखरे बचपन भी उजाले की ओर लौट सकते हैं।

भिक्षा से शिक्षा की ओर” अभियान से अब तक 82 बच्चे जुड़े शिक्षा की मुख्यधारा से(1)

यह सिर्फ एक प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संवेदना और नीति का संगम है — जो बताता है कि “सरकार तभी सफल है जब वह सबसे कमजोर की जिंदगी बदल सके।”

पहल की शुरुआत — “भिक्षा से शिक्षा” मिशन

देहरादून ज़िला प्रशासन ने बच्चों के भविष्य को भिक्षावृत्ति से मुक्त करने के लिए एक क्रांतिकारी अभियान चलाया — भिक्षा से शिक्षा
इस मिशन के तहत सड़क, ट्रैफिक सिग्नल और बाजारों में भीख मांगने वाले बच्चों को रेस्क्यू कर उनके लिए सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सुविधाएँ और स्कूल शिक्षा उपलब्ध कराई जा रही है।

इस मुहिम का नेतृत्व जिलाधिकारी सविन बंसल कर रहे हैं, जिन्होंने बाल संरक्षण विभाग, पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य और NGO के साथ मिलकर एक इंटर-डिपार्टमेंटल टास्क-फोर्स बनाई है।

प्रशासनिक कार्रवाई — कैसे हो रहा है बदलाव

  1. रेस्क्यू और रिहैबिलिटेशन:
    शहर के विभिन्न इलाकों में रेस्क्यू टीम सक्रिय की गई हैं, जो सड़क पर भिक्षावृत्ति या बाल-श्रम में लिप्त बच्चों की पहचान कर तुरंत उन्हें बचा रही हैं।
  2. पहचान और दस्तावेज़:
    बच्चों के आधार कार्ड, स्वास्थ्य रिकॉर्ड और अनाथ प्रमाण पत्र बनाए जा रहे हैं ताकि उन्हें सरकारी योजनाओं में जोड़ा जा सके।
  3. शिक्षा से जुड़ाव:
    अब तक 82 बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाया गया है — पहले चरण में 51 और दूसरे चरण में 31 बच्चे।
  4. नई सुविधा:
    बच्चों की निरंतर निगरानी और देखभाल के लिए साधूराम इंटर कॉलेज में एक आधुनिक Intensive Care Centre बनाया जा रहा है जिसकी लागत लगभग ₹1.5 करोड़ है।

आंकड़े जो उम्मीद जगाते हैं

  • जुलाई से सितंबर 2025 के बीच बाल संरक्षण समिति में 136 मामले प्रस्तुत हुए।
  • 138 बच्चों को बाल श्रम और भिक्षावृत्ति से मुक्त कराया गया।
  • 70 बच्चे भिक्षावृत्ति में और 14 बाल श्रम में लिप्त पाए गए।
  • अन्य राज्यों के 6 बच्चों को उनके परिजनों के पास सुरक्षित भेजा गया।

इन आँकड़ों के पीछे सिर्फ प्रशासन नहीं, बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी की झलक है।

चुनौतियाँ अब भी बाकी हैं

हर नीति की तरह इस पहल के भी कुछ कठिन मोर्चे हैं:

  • परिजनों की पहचान और कानूनी प्रक्रिया लंबी है।
  • जिन बच्चों ने कभी स्कूल नहीं देखा, उन्हें शिक्षण प्रक्रिया में जोड़ना आसान नहीं।
  • कुछ आश्रय गृह अब भी JJ Act के तहत पंजीकृत नहीं हैं।
  • वित्तीय सहायता और सामुदायिक भागीदारी की निरंतरता ज़रूरी है।

फिर भी, यह पहल दिखाती है कि बदलाव मुमकिन है — बस राजनीतिक इच्छाशक्ति और मानवीय दृष्टिकोण चाहिए।

प्रशासनिक आदेश — पारदर्शिता और निगरानी

जिलाधिकारी ने वार्ड व ग्राम स्तर की बाल संरक्षण समितियों को सक्रिय करने के आदेश दिए हैं।
साथ ही Mission Vatsalya के तहत मिलने वाले 5 % अनटाइड फंड का उपयोग बच्चों के कल्याण में करने को कहा गया है।
RBSK टीमों को 10 दिनों के भीतर सभी सरकारी-गैरसरकारी आश्रयों में स्वास्थ्य जांच और टीकाकरण पूरा करने के निर्देश मिले हैं।

“अगर देहरादून कर सकता है, तो बाकी क्यों नहीं?”

यह कहानी सिर्फ देहरादून की नहीं, बल्कि पूरे भारत की हो सकती है।
अगर एक जिला प्रशासन यह दिखा सकता है कि सड़कों के बच्चे स्कूल तक पहुँच सकते हैं, तो सवाल यह उठता है —
क्या हमारे बाकी जिलों में ऐसी इच्छाशक्ति की कमी है?
क्या हमारे शहरों को भी “भिक्षा से शिक्षा” जैसी मानवीय मुहिम की ज़रूरत नहीं?

सिस्टम को बदलना मुश्किल नहीं — बस दिल से सोचने की ज़रूरत है।

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