धनतेरस 2025 की संपूर्ण जानकारी प्राप्त करें। जानिए धनतेरस का इतिहास, पौराणिक महत्व, शुभ मुहूर्त में पूजा विधि, नए बर्तन और सोना खरीदने की परंपरा। Deepawali के इस पहले दिन की शुभकामनाएं।
नमस्ते पाठकों! क्या आप भी दिवाली की रोशनियों और खुशियों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं? तो जान लीजिए कि इस खुशियों भरे सिलसिले की शुरुआत होती है धनतेरस से! यह वह पावन दिन है जब घर-घर में दीपक जलते हैं, नए बर्तन और सोने-चांदी की खरीदारी का रिवाज़ निभाया जाता है, और माँ लक्ष्मी व भगवान धन्वंतरी की कृपा पाने के लिए पूजा-अर्चना की जाती है।
सिर्फ खरीदारी का दिन नहीं, बल्कि धनतेरस हमें जीवन के सबसे बड़े धन – स्वास्थ्य और पारिवारिक सुख – का महत्व भी याद दिलाता है। यह त्योहार हमारी पुरानी परंपराओं और आधुनिक जीवनशैली के बीच एक सुंदर कड़ी है। तो आइए, इस धनतेरस न सिर्फ धन, बल्कि सेहत और खुशियों की कामना करें!
धनतेरस 2025: परिचय एवं महत्व
धनतेरस, जिसे धनत्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है, दीपावली उत्सव के पांच दिवसीय महोत्सव का प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। यह त्योहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। ‘धनतेरस’ शब्द दो शब्दों – ‘धन’ (संपदा) और ‘तेरस’ (तेरहवीं तिथि) के मेल से बना है। इस दिन समृद्धि, स्वास्थ्य और सौभाग्य के देवताओं की पूजा की जाती है और नए सोने-चांदी के आभूषण, बर्तन अथवा बिजली के उपकरण खरीदने की परंपरा है, जो घर में सुख-समृद्धि लाने का प्रतीक माना जाता है।
धनतेरस का ऐतिहासिक एवं पौराणिक इतिहास
धनतेरस का उल्लेख विभिन्न पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में मिलता है, जो इसके गहन ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। इससे जुड़ी प्रमुख कथाएँ इस प्रकार हैं:
1. समुद्र मंथन और भगवान धन्वंतरी का प्रकटन
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन देवताओं और असुरों के समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरी ‘अमृत कलश’ लेकर प्रकट हुए थे। धन्वंतरी को आयुर्वेद का जनक और स्वास्थ्य与चिकित्सा का देवता माना जाता है। इसीलिए धनतेरस के दिन उनकी पूजा करने से आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
2. राजा हिमा के पुत्र की कथा
एक अन्य प्रसिद्ध कथा के अनुसार, राजा हिमा के 16 वर्षीय पुत्र की मृत्यु का समय शादी के चौथे दिन सर्प दंश से निर्धारित था। उस दिन उसकी नवविवाहिता पत्नी ने उसे सोने नहीं दिया। उसने पूरे महल में सोने-चांदी के आभूषण और सिक्कों का ढेर लगा दिया तथा असंख्य दीप जलाए। जब यमराज सर्प का रूप धरकर आए, तो दीपों की चमक और आभूषणों की झिलमिलाहट से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वह उस ढेर पर बैठ गए और पूरी रात उस युवती के गीत सुनते रहे, तब तक घड़ी का शुभ मुहूर्त निकल गया। इस प्रकार, उसने अपने पति के प्राण बचा लिए। इसी घटना के कारण इस दिन ‘यम दीपदान’ की परंपरा भी शुरू हुई।
धनतेरस 2025 का उत्सव और पूजन विधि
धनतेरस का उत्सव उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन की मुख्य परंपराएँ और पूजा की विधि निम्नलिखित है:
1. खरीदारी (धन खरीददारी)

- सोना-चांदी: इस दिन सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के या बर्तन खरीदना अत्यंत शुभ माना जाता है। यह धन व समृद्धि का प्रतीक है।
- नए बर्तन: धातु के नए बर्तन, विशेष रूप से पीतल या तांबे के, खरीदे जाते हैं। मान्यता है कि इससे लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।
- उपकरण: आधुनिक समय में लोग बिजली के नए उपकरण जैसे गाड़ी, मोबाइल फ़ोन आदि भी खरीदते हैं।
2. पूजन विधि

- शाम का समय: पूजा संध्या के समय की जाती है।
- स्नान एवं शुद्धि: सबसे पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- वेदी तैयार करना: एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर गणेश-लक्ष्मी, धन्वंतरी और कुबेर की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- दीप जलाना: घर के मुख्य द्वार पर और पूजा स्थल पर दीपक जलाएं। दक्षिण दिशा की ओर एक दीपक जलाकर यमराज के लिए ‘यम दीपदान’ भी किया जाता है।
- पूजा: देवताओं को फूल, अक्षत, रोली, धूप-दीप अर्पित करें। मिष्ठान्न का भोग लगाएं।
- प्रार्थना: धन-धान्य, स्वास्थ्य और सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें।
3. यम दीपदान
संध्या के समय एक दीपक जलाकर उसे दक्षिण दिशा में रखा जाता है और यमराज से प्रार्थना की जाती है कि वे घर-परिवार में अकाल मृत्यु न लेकर आएं।
धनतेरस 2025: प्रमुख बिंदुओं की सारणी
| विशेष बिंदु | विवरण |
|---|---|
| त्योहार का नाम | धनतेरस / धनत्रयोदशी |
| तिथि (2025) | कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (अक्टूबर/नवंबर 2025 में, सटीक तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार) |
| मुख्य देवता | भगवान धन्वंतरी, माता लक्ष्मी, कुबेर, यमराज |
| महत्व | धन, स्वास्थ्य और सौभाग्य की प्राप्ति, अकाल मृत्यु से रक्षा |
| प्रमुख परंपराएं | सोना-चांदी/बर्तन खरीदना, लक्ष्मी-धन्वंतरी पूजा, यम दीपदान |
| प्रसाद | मिष्ठान्न, नारियल, फल |
| शुभ रंग | लाल, पीला, सुनहरा |
निष्कर्ष
धनतेरस केवल एक खरीदारी का पर्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि सच्चा ‘धन’ केवल सोना-चांदी ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, पारिवारिक सुख और आंतरिक समृद्धि है। धन्वंतरी की पूजा से प्राप्त होने वाला स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है। आइए, धनतेरस 2025 के इस पावन अवसर पर न केवल भौतिक संपदा, बल्कि आत्मिक शांति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें।
धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं!
धनतेरस 2025 कब है?
वर्ष 2025 में धनतेरस शनिवार, 18 अक्टूबर को मनाई जाएगी। यह दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को आता है और दीपावली पर्व की शुरुआत मानी जाती है।
धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
धनतेरस 2025 में पूजा का शुभ समय शाम 7:15 बजे से 8:19 बजे तक रहेगा। प्रदोष काल के दौरान वृषभ लग्न में पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है।
धनतेरस पर कौन-कौन सी देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?
इस दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, कुबेर देव, और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। धन्वंतरि देव स्वास्थ्य के देवता हैं, इसलिए इस दिन को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस भी कहा जाता है।
धनतेरस पर क्या खरीदना शुभ माना जाता है?
इस दिन सोना, चाँदी, बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन, झाड़ू, दीपक और पूजा-सामग्री जैसी चीजें खरीदना शुभ माना जाता है। यह धन और सौभाग्य का प्रतीक है।
क्या धनतेरस पर सोना न खरीद पाने पर कुछ और भी खरीदा जा सकता है?
जी हाँ। यदि सोना न खरीद सकें तो चाँदी का सिक्का, पीतल या स्टील का बर्तन, या झाड़ू खरीदना भी उतना ही शुभ माना जाता है।
धनतेरस का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व क्या है?
धनतेरस का अर्थ “धन की तेरहवीं” है। इस दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए इसे स्वास्थ्य, दीर्घायु, और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
धनतेरस और दीपावली में क्या अंतर है?
धनतेरस दीपावली का पहला दिन होता है, जब लोग खरीदारी और लक्ष्मी-पूजा करते हैं। दीपावली का मुख्य दिन दो दिन बाद आता है, जब माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की विधिवत पूजा की जाती है।
धनतेरस 2025 पर कौन-सा मंत्र या आरती सबसे शुभ है?
लक्ष्मी मंत्र: “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ महालक्ष्म्यै नमः”
धन्वंतरि मंत्र: “ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलश हस्ताय”
इन मंत्रों का जाप धन और स्वास्थ्य की वृद्धि करता है।
क्या धनतेरस केवल भारत में ही मनाई जाती है?
नहीं, धनतेरस केवल भारत में नहीं बल्कि नेपाल, मॉरिशस, फिजी, और अन्य भारतीय प्रवासी देशों में भी मनाई जाती है। वहाँ भी लोग इसी दिन दीप जलाकर, बर्तन खरीदकर और लक्ष्मी पूजा करते हैं।






