2025 का नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize 2025) इस बार वेनेज़ुएला की साहसी नेता मारिया कोरीना माचाडो (María Corina Machado) को मिला है।
नॉर्वे की नोबेल कमेटी ने उन्हें यह सम्मान वेनेज़ुएला में लोकतंत्र, मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता के लिए उनके अहिंसक संघर्ष के लिए दिया। मारिया कोरीना माचाडो को यह पुरस्कार उस दौर में मिला है जब दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र पर खतरे बढ़ रहे हैं।
उनकी जीत ने दुनिया को याद दिलाया है कि “शांति, तभी संभव है जब जनता को स्वतंत्रता और न्याय मिले।”
नोबेल पुरस्कार का परिचय: मानवता की सेवा का सर्वोच्च सम्मानप्त परिचय
नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize) विश्व का सबसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान है, जिसकी स्थापना स्वीडिश वैज्ञानिक अल्फ्रेड नोबेल (Alfred Nobel) की स्मृति में की गई थी। डायनामाइट के आविष्कारक नोबेल ने अपनी वसीयत में अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा उन लोगों को सम्मानित करने के लिए समर्पित किया जिन्होंने मानवता, विज्ञान, साहित्य, चिकित्सा, शांति और अर्थशास्त्र के क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान दिया हो। यह पुरस्कार पहली बार 10 दिसंबर 1901 को (नोबेल की पुण्यतिथि पर) प्रदान किया गया। पाँच पुरस्कार स्टॉकहोम (स्वीडन) में और शांति पुरस्कार (Peace Prize) ओस्लो (नॉर्वे) में दिया जाता है। आज नोबेल पुरस्कार मानवता की सेवा, ज्ञान, और करुणा का प्रतीक माना जाता है, जो यह संदेश देता है कि समर्पण और सकारात्मक कार्यों से ही विश्व में स्थायी शांति और प्रगति लाई जा सकती है।
मारिया कोरीना माचाडो: 2025 नोबेल शांति पुरस्कार विजेता

मारिया कोरीना माचाडो वेनेज़ुएला की एक साहसी राजनीतिक नेता और लोकतंत्र कार्यकर्ता हैं।
उन्होंने 2002 में Súmate की स्थापना की और देश में चुनावी पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष किया।
अत्याचार और राजनीतिक दमन के बावजूद उन्होंने अहिंसक तरीके से लोकतंत्र और मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाई।
उनकी यह लगातार प्रतिबद्धता और साहस उन्हें 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार दिलाने वाला बना।
मारिया कोरीना माचाडो: जीवन, शिक्षा और प्रारंभिक संघर्ष
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| जन्म | 7 अक्टूबर 1967, कराकस, वेनेज़ुएला |
| शिक्षा | इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग (Universidad Católica Andrés Bello), मास्टर्स इन फाइनेंस (IESA) |
| प्रारंभिक कार्य | 1992 में Atenea Foundation की स्थापना – सड़क बच्चों की मदद के लिए। |
| लोकतांत्रिक पहल | 2002 में Súmate संगठन की सह-संस्थापक – चुनाव की पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए। |
नोबेल कमेटी ने क्यों चुना मारिया कोरीना माचाडो को
नॉर्वे की नोबेल कमेटी ने माचाडो को निम्नलिखित कारणों से 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुना:
- अहिंसक लोकतांत्रिक संघर्ष:
उन्होंने नागरिकों को यह सिखाया कि सत्ता परिवर्तन का रास्ता हिंसा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी है। - विपक्ष की एकता:
उन्होंने विभिन्न राजनीतिक गुटों को एकजुट कर वेनेज़ुएला की लोकतंत्र बहाली के लिए साझा मोर्चा तैयार किया। - अटल साहस और निडरता:
धमकियों और दमन के बावजूद उन्होंने देश नहीं छोड़ा। आज भी वे छिपकर अपने आंदोलन को दिशा दे रही हैं। - वैश्विक लोकतंत्र का प्रतीक:
नोबेल कमेटी ने कहा कि “माचाडो की कहानी सिर्फ वेनेज़ुएला की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की है — जहाँ लोग स्वतंत्रता और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
वैश्विक प्रभाव और संदेश
मारिया कोरीना माचाडो की यह जीत सिर्फ एक पुरस्कार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए वैश्विक प्रेरणा है।
| क्षेत्र / योगदान | प्रभाव / कार्य | पुरस्कार / सम्मान | वर्ष |
|---|---|---|---|
| लोकतंत्र की रक्षा | स्वतंत्र चुनाव और न्यायपालिका की बहाली के लिए लगातार संघर्ष। | — | — |
| महिलाओं की प्रेरणा | वेनेज़ुएला और लैटिन अमेरिका में महिला नेतृत्व और राजनीतिक भागीदारी का प्रतीक। | — | — |
| अंतरराष्ट्रीय पहचान | Václav Havel Human Rights Prize और Sakharov Prize जैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मान। | Václav Havel Prize | 2019 |
| Sakharov Prize | 2024 | ||
| वैश्विक लोकतांत्रिक प्रेरणा | अधिनायकवाद और तानाशाही के खिलाफ विश्व स्तर पर लोकतंत्र का समर्थन। | — | — |
| सिविल सोसाइटी एक्टिविज्म | 2002 में Súmate की स्थापना — चुनावी पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों के लिए। | — | 2002 |
| सामाजिक कार्य (शुरुआती योगदान) | 1992 में Atenea Foundation की स्थापना — कराकस के सड़क बच्चों की मदद। | — | 1992 |
| राजनीतिक करियर | नेशनल असेंबली की सदस्य, विपक्षी दलों को एकजुट करना। | — | 2010–2014 |
मारिया कोरीना माचाडो का राजनीतिक सफर
- 2010 में वेनेज़ुएला नेशनल असेंबली की सदस्य बनीं – सबसे अधिक मतों से विजेता।
- 2014 में शासन के दबाव में संसद से निष्कासित कर दी गईं।
- Vente Venezuela पार्टी की राष्ट्रीय समन्वयक हैं।
- 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्हें उम्मीदवार बनने से प्रतिबंधित किया गया।
- इसके बावजूद, उन्होंने विपक्ष को एकजुट किया और लोकतांत्रिक आंदोलन को मजबूत बनाया।
- कई बार राजनीतिक उत्पीड़न के बावजूद उन्होंने देश नहीं छोड़ा — यह उनके साहस और समर्पण का प्रमाण है।
क्यों Donald Trump नहीं जीत सके 2025 का नोबेल शांति पुरस्कार

2025 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) का नाम भी चर्चा में रहा,
लेकिन वे औपचारिक रूप से नामांकित (officially nominated) नहीं हुए।
Donald Trump को यह पुरस्कार ना मिलने के मुख्य कारण हो सकते हैं :
- नोबेल सिद्धांतों से विरोधाभास: “अंतरराष्ट्रीय भाईचारे” की भावना के बजाय ट्रंप की America First नीति कई वैश्विक समझौतों से बाहर निकलने पर केंद्रित थी।
- दीर्घकालिक योगदान की कमी: नोबेल कमेटी आमतौर पर दीर्घकालिक शांति और लोकतंत्र निर्माण को प्राथमिकता देती है, न कि अल्पकालिक कूटनीतिक सौदों को।
- कतांत्रिक मूल्यों पर प्रश्न: ट्रंप की घरेलू राजनीति में लोकतांत्रिक संस्थानों को कमजोर करने के आरोप लगे।
- अति प्रचार: स्वयं के लिए नोबेल अभियान चलाना, कमेटी की परंपराओं के विपरीत माना जाता है।
डोनाल्ड ट्रंप और 2025 के नोबेल पुरस्कार की पात्रता
- नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकन की अंतिम तिथि जनवरी 2025 में समाप्त हो गई थी।
- कई मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप ने अपना आवेदन या नामांकन प्रस्ताव अंतिम तिथि के बाद प्रस्तुत किया, जिससे वे 2025 के पुरस्कार के लिए पात्र नहीं रहे।
- हालांकि, नोबेल कमेटी ने इस पर कोई सीधा बयान नहीं दिया, लेकिन यह स्पष्ट है कि समय सीमा के बाद प्राप्त नामांकन पर विचार नहीं किया जाता।
👉 यदि डोनाल्ड ट्रंप 2025 के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवता, शांति और वैश्विक सहयोग के लिए ठोस कार्य करते हैं, तो वे 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize 2026) के लिए पात्र उम्मीदवार हो सकते हैं।
उनके समर्थकों का कहना है कि मध्य पूर्व शांति वार्ताओं, अब्राहम समझौते, और वैश्विक स्थिरता में उनका योगदान इस दिशा में अहम हो सकता है
भारत के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता
| नाम | वर्ष | योगदान |
|---|---|---|
| मदर टेरेसा | 1979 | मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी के माध्यम से गरीबों और बीमारों की सेवा। |
| 14वें दलाई लामा | 1989 | अहिंसा और करुणा के माध्यम से तिब्बती संघर्ष को नई दिशा दी। |
| कैलाश सत्यार्थी | 2014 | बाल मजदूरी और बच्चों की शिक्षा के अधिकार के लिए वैश्विक आंदोलन चलाया (मलाला यूसुफजई के साथ साझा)। |
निष्कर्ष
मारिया कोरीना माचाडो की यह जीत लोकतंत्र, साहस और मानवाधिकारों की जीत है।
उन्होंने साबित किया कि असली शांति केवल युद्ध से नहीं, बल्कि न्याय, स्वतंत्रता और नागरिक सम्मान से आती है।
उनकी कहानी यह भी याद दिलाती है कि हर अधिनायक के सामने
एक ऐसी आवाज़ उठती है जो झुकती नहीं — वही लोकतंत्र की सच्ची आत्मा है।
वहीं, डोनाल्ड ट्रंप के मामले से यह भी स्पष्ट हुआ कि
नोबेल पुरस्कार केवल “लोकप्रियता” नहीं, बल्कि “समय पर आवेदन” और “स्थायी मानवीय योगदान” पर निर्भर करता है।
यदि ट्रंप 2026 तक वैश्विक शांति के लिए ठोस कदम उठाते हैं,
तो वे भविष्य में इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए एक संभावित दावेदार बन सकते हैं।
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