मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। यहां जहरीली कफ सिरप पीने से अब तक 12 मासूम बच्चों की मौत हो चुकी है। जांच में खुलासा हुआ है कि “कोल्डसफ” नामक कफ सिरप में ज़हरीले रासायनिक तत्व डाइथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) और डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) पाए गए, जो गुर्दे और लीवर को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाते हैं। प्रशासन की धीमी कार्रवाई और जांच में देरी के कारण हालात और बिगड़ गए। अगर समय पर जांच की जाती, तो कई बच्चों की जान बचाई जा सकती थी।
मुख्य बिंदु (Highlights):
- छिंदवाड़ा में जहरीली कफ सिरप से अब तक 12 बच्चों की मौत।
- जांच में सिरप में जहरीले रासायनिक तत्व डाइथिलीन ग्लाइकॉल की पुष्टि।
- एमपी सरकार ने रिपोर्ट में “जहर” की मौजूदगी मानी।संबंधित कंपनी पर FIR, सभी उत्पादों पर प्रतिबंध।
- मृतकों में 2 से 5 वर्ष तक के मासूम बच्चे शामिल।
एमपी सरकार की रिपोर्ट में ‘जहर’ की पुष्टि
मध्य प्रदेश सरकार ने अब आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया है कि कफ सिरप में “जहरीला पदार्थ” मिला था। रिपोर्ट में सिरप में 48.6% तक DEG और 46.2% डाइएथिलीन ग्लाइकॉल पाया गया है।राज्य सरकार ने संबंधित फार्मा कंपनी के सभी उत्पादों पर बैन लगाया है और FIR दर्ज की गई है। हालांकि, केंद्र सरकार ने टिप्पणी की कि “राज्य सरकार शुरुआत में स्लीपिंग मोड में थी” यानी कार्रवाई में देरी हुई।
30 दिन से मौत का तमाशा देखती रही सरकार
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में जहरीली कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत का सिलसिला रुक नहीं रहा। अब तक 12 मासूमों की जान जा चुकी है। पहले तीन मौतों के बाद भी जांच और कार्रवाई में देरी होती रही। अगर समय पर जांच की जाती, तो विशेषज्ञों के अनुसार 7-8 बच्चों की जान बचाई जा सकती थी।मरने वाले बच्चों की उम्र 2 से 5 साल के बीच थी। सभी ने “कोल्डसफ” ब्रांड की कफ सिरप पी थी, जो स्थानीय मेडिकल स्टोर्स से खरीदी गई थी। शुरुआती जांच में सिरप में डाइथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) नामक जहरीला रसायन पाया गया — जो गुर्दे और लीवर को तेजी से नुकसान पहुंचाता है।
डॉक्टर और मेडिकल स्टोर पर भी संदेह
जांच में सामने आया है कि कफ सिरप डॉ. प्रवीन सोनी द्वारा बच्चों को लिखी गई थी और उनके ही रिश्तेदार की मेडिकल दुकान से खरीदी गई। वहां से करीब 300 सिरप बोतलें बेची गई थीं।अब प्रशासन डॉक्टर, मेडिकल स्टोर मालिक और कंपनी के बीच के संबंधों की जांच कर रहा है।
देश में दवा निगरानी की प्रक्रिया कमजोर
भारत में दवा निगरानी प्रणाली की कमजोरी एक बार फिर सामने आई है।2017 की रिपोर्ट में भी बताया गया था कि देश के कई राज्यों में औषधि परीक्षण प्रयोगशालाएं या तो पुरानी हैं या संसाधनहीन।तमिलनाडु जैसे राज्यों ने 2 दिन में रिपोर्ट दी, जबकि मध्य प्रदेश को 6 दिन लगे — जो सिस्टम की धीमी गति को दर्शाता है।
एमपी में 76 दवाएं अमानक
राज्य सरकार की हालिया जांच में 76 दवाएं अमानक और दूषित पाई गई हैं, जिनमें इंजेक्शन, पैरासिटामोल, ORS और एंटीबायोटिक शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि राज्य में औषधि गुणवत्ता निगरानी बेहद कमजोर है।
छिंदवाड़ा की इस दुखद घटना ने एक बार फिर भारत की औषधि गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।12 मासूम बच्चों की जान गई, लेकिन यह केवल एक जिले की समस्या नहीं — यह देशभर की दवा सुरक्षा व्यवस्था का आईना है।
सरकार को अब सख्त कदम उठाने होंगे ताकि “कफ सिरप” जैसी दवाएं किसी और परिवार का भविष्य न लूट सकें।







