सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर 2025 को उत्तराखंड राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें आयोग ने यह स्पष्ट किया था कि किसी व्यक्ति के नाम कई मतदाता-सूचियों में होने के बावजूद केवल इसी आधार पर उसके नामांकन को अस्वीकार नहीं किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए आयोग पर ₹2,00,000 (दो लाख) का जुर्माना लगाया। यह फैसला वोटर-लिस्ट की वैधता और चुनावी प्रक्रियाओं में कानून की प्राथमिकता को पुष्ट करता है।
विवाद क्या था — आयोग ने क्या कहा था?
राज्य निर्वाचन आयोग ने एक क्लेरिफिकेशन जारी किया था जिसमें कहा गया था कि तकनीकी कारणों से किसी व्यक्ति के नाम कई मतदाता-सूचियों में दर्ज हो सकते हैं और ऐसे मामलों में केवल डुप्लीकेट प्रविष्टि के कारण नामांकन खारिज न किया जाए। आयोग का तर्क था कि कई बार प्रशासनिक या तकनीकी त्रुटियों की वजह से डुप्लीकेट एंट्रीज होती हैं और उम्मीदवारों के अधिकारों को केवल इसी आधार पर प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और तर्क
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कोई प्रशासनिक निकाय विधि के स्पष्ट प्रावधानों के विपरीत जाकर कानून का नया अर्थ तय नहीं कर सकता। सुनवाई में पूछे गए प्रश्नों ने यह दर्शाया कि प्रशासनिक सहूलियत के नाम पर वैधानिक पाबंदियों को कमजोर नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने आयोग की याचिका खारिज कर दी और निवारक संदेश देते हुए ₹2,00,000 का जुर्माना लगाया।
हाई कोर्ट का रुख
उत्तराखंड हाई कोर्ट ने जुलाई 2025 में आयोग के इस क्लेरिफिकेशन पर रोक लगाई। हाई कोर्ट ने कहा कि उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 की धारा 9(6) व 9(7) स्पष्ट रूप से एक से अधिक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में एक ही व्यक्ति के पंजीकरण पर रोक लगाती हैं, इसलिए आयोग का क्लेरिफिकेशन वैधानिक प्रावधानों के विपरीत था और उसे रोका जाना चाहिए।
कानून क्या कहता है?
उत्तराखंड पंचायती राज अधिनियम, 2016 की धारा 9 में स्पष्ट प्रावधान है:
- धारा 9(7): यदि किसी व्यक्ति का नाम नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत या छावनी की मतदाता सूची में है, तो वह किसी पंचायत क्षेत्र की सूची में तब तक शामिल नहीं हो सकता जब तक कि पिछली सूची से उसका नाम हटा न दिया जाए।
- धारा 9(6): कोई भी व्यक्ति एक से अधिक प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में या एक ही क्षेत्र की सूची में बार-बार पंजीकरण का हकदार नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए आयोग की याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा कि जब कानून में स्पष्ट रूप से प्रतिबंध है तो आयोग का दिया गया स्पष्टीकरण सीधा कानून के प्रावधानों के विपरीत है।
पीठ ने कड़े शब्दों में टिप्पणी की —
“आयोग संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ कैसे जा सकता है?”
इसके साथ ही आयोग पर ₹2 लाख का जुर्माना भी लगाया गया।
असर और महत्व
- यह फैसला अन्य राज्यों के निर्वाचन आयोगों के लिए भी एक मिसाल साबित होगा।
- इस फैसले के बाद उत्तराखंड पंचायत चुनावों में प्रत्याशियों के लिए कड़े नियम लागू होंगे।
- डबल वोटर लिस्ट या एक से अधिक मतदाता सूची में नाम होने की स्थिति में नामांकन खारिज किया जा सकेगा।
- यह आदेश भविष्य में होने वाली चुनावी गड़बड़ियों और कानूनी विवादों को रोकने में मदद करेगा।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय साफ संकेत देता है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को कानून की सीमा से बाहर जाकर कोई निर्णय लेने की अनुमति नहीं है।
कानून और संविधान की व्याख्या केवल न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में आती है। आयोग का काम चुनावों को निष्पक्ष और पारदर्शी ढंग से कराना है, न कि कानूनी प्रावधानों की अनदेखी करना।
👉 इस फैसले से न केवल उत्तराखंड पंचायत चुनावों में पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि भविष्य में डबल वोटर रजिस्ट्रेशन जैसी गड़बड़ियों पर भी रोक लगेगी।








