गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय (HNBGU) के विज्ञान जगत के दो प्रतिष्ठित नाम — प्रो. राकेश चन्द्र रमोला और प्रो. आर. के. मैखुरी — स्टैनफोर्ड/एल्सेवियर द्वारा तैयार की जाने वाली अंतरराष्ट्रीय “Top 2% Scientists (2025)” सूची में शामिल किये गए हैं। यह सूची वैज्ञानिकों के उद्धरण (citations) और शोध प्रभाव के समग्र मेट्रिक्स के आधार पर तैयार की जाती है और विश्व स्तर पर शोध-प्रभाव का एक मानक सूचकांक मानी जाती है।
स्टैनफोर्ड/एल्सेवियर की यह सूची उद्धरण-आधारित (citation-based) मानकों पर तैयार की जाती है और शोध-प्रभाव (research impact) के कई मेट्रिक्स को मिलाकर एक composite indicator के आधार पर वार्षिक रूप से टॉप 2% वैज्ञानिकों की पहचान करती है। यह सूची Scopus जैसी प्रमुख डेटाबेस के डाटा का उपयोग कर शोध-प्रकाशनों, उद्धरणों, H-index एवं सह-लेखन जैसे मापदंडों के माध्यम से वैज्ञानिकों के दीर्घकालिक एवं हालिया प्रभाव का आकलन करती है। इसलिए किसी भी शोधकर्ता के लिए इस सूची में स्थान पाना वैश्विक मान्यता और शोध-प्रतिष्ठा का संकेत माना जाता है।
प्रो. रमोला का विद्वत् योगदान
प्रो. राकेश चन्द्र रमोला गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर हैं। उनका शोधक्षेत्र विशेषकर रेडियोलॉजी, रेडियोरसायन, रेडियोडोसिमेट्री और पर्यावरणीय रेडियोलॉजी से जुड़ा हुआ है। वर्षों से प्रकाशित उनके शोध-पत्रों और उन पर हुए उद्धरणों ने उन्हें राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाई है। लगातार चौथे वर्ष टॉप-2% सूची में बने रहना यह दर्शाता है कि उनके शोध का प्रभाव निरंतर और उच्च स्तर का रहा है। यह उपलब्धि न केवल व्यक्तिगत सम्मान है बल्कि उनके विभाग और विश्वविद्यालय की शोध-छवि को भी सुदृढ़ करती है।
प्रो. आर. के. मैखुरी — हिमालयी पर्यावरण के शोध में प्रमुख
प्रो. आर. के. मैखुरी एक अनुभवी पर्यावरण विज्ञानी हैं जिनका कार्य विशेषकर हिमालयी पारिस्थितिकी, पर्यावरण परिवर्तन, स्थानीय जैवविविधता संरक्षण और सतत विकास से संबंधित है। हिमालय जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र पर किए गए उनके कार्यों ने क्षेत्रीय व राष्ट्रीय चर्चा में योगदान दिया है। उनके शोध-पत्रों के उद्धरणिक प्रभाव ने उन्हें भी वैश्विक टॉप-2% सूची में स्थान दिलाया है, जो इस क्षेत्र के शोध के महत्व को दर्शाता है।
उत्तराखंड और गढ़वाल विश्वविद्यालय के लिए क्या मायने रखता है यह सम्मान?
यह मान्यता उत्तराखंड के शैक्षणिक माहौल के लिए बड़ा सकारात्मक संकेत है। ऐसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के सम्मान कई तरह से लाभ पहुँचा सकते हैं — विश्वविद्यालय की रिसर्च प्रोफ़ाइल मजबूत होती है, युवा शोधार्थियों को प्रेरणा मिलती है, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय ग्रांट व सहयोग के दरवाज़े खुलते हैं और स्थानीय शोध-प्रवर्तन (research ecosystem) को बल मिलता है। विशेषकर पहाड़ी और हिमालयी विषयों पर शोध करने वाले संस्थानों के लिए यह तरह की मान्यताएँ उनकी विशेषज्ञता को वैश्विक मानचित्र पर रखती हैं।
स्थानीय प्रभाव और भविष्य की संभावनाएँ
गढ़वाल विश्वविद्यालय तथा उत्तराखंड के अन्य शैक्षणिक संस्थानों में इस प्रकार की उपलब्धियाँ शोध-संस्कृति को सक्रिय करने में मदद करती हैं। इससे छात्र-छात्राओं में अनुसंधान के प्रति रूचि बढ़ती है और स्थानीय समस्याओं—जैसे हिमालयी पर्यावरण संरक्षण, जल प्रबंधन, ऊर्जा व सतत विकास—पर केंद्रित परियोजनाओं को बढ़ावा मिलता है। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों के अंतरराष्ट्रीय सहयोग व औद्योगिक भागीदारी की संभावनाएँ भी बढ़ती हैं, जो दीर्घकालिक रूप से क्षेत्रीय विकास में योगदान कर सकती हैं।
विशेषज्ञता और निरंतरता का प्रमाण
किसी भी शोधकर्ता के लिए बार-बार टॉप-2% सूची में बने रहना उनके क्षेत्र में दीर्घकालिक प्रभाव और निरंतर योगदान का प्रमाण होता है। यह संकेत देता है कि उनके शोध कार्य केवल एक बार की उपलब्धि नहीं बल्कि समय के साथ विकसित और प्रासंगिक रहे हैं। प्रो. रमोला और प्रो. मैखुरी दोनों के मामलों में यह निरंतरता उनके व्यक्तिगत परिश्रम व शोध-गुणवत्ता का प्रतिफल है।
समापन और बधाई
प्रो. रमोला और प्रो. आर. के. मैखुरी को इस प्रतिष्ठित वैश्विक सूची में शामिल किए जाने पर हार्दिक बधाई। यह उपलब्धि उत्तराखंड के शैक्षणिक मानचित्र पर एक सकारात्मक छाप छोड़ती है और आने वाली पीढ़ियों के शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा बनेगी। स्थानीय शैक्षणिक समुदाय, विश्वविद्यालय प्रशासन और राज्य सरकार को चाहिए कि वे इन उपलब्धियों को और बढ़ावा देने के लिए आगे आयें—अनुदान, शोध-इन्फ्रास्ट्रक्चर और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को सक्षम बनाकर।







